
Eid– ul– Adha : पूरे देश में आज बकरीद का त्यौहार जोरों से मनाया जा रहा हैं। ये त्योहार ईद से लगभग 60 दिन बाद मनाया जाता हैं, इस दिन दुनियां के सारे मुसलमान अल्लाह की बारगाह में अपने प्यारे जानवर की कुर्बानी करते हैं। और खुदा से अपने कुर्बानी को कुबूल करने की दुआ करते हैं
कुर्बानी कहां से शुरू हुआ?
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इस्लाम धर्म में यह मान्यता हैं की आज से लगभग 1400 साल पहले अल्लाह ने हज़रत इब्राहीम अलैहिस्लाम के ख़्वाब में हुक्म दिया की वो अल्लाह के बारगाह में कुर्बानी करे। ये ख़्वाब देखकर हज़रत इब्राहीम अलैहिस्लाम सुबह में उठे और अल्लाह की बारगाह में 100 ऊंट कुर्बान कर दिए। अगली रात फिर से अल्लाह का यहीं हुक्म था की वो कुर्बानी करे, अगले दिन हज़रत इब्राहीम अलैहिस्लाम ने फ़िर से 100 ऊंट अल्लाह की बारगाह में कुर्बान कर दिए। ये सिलसिला कई दिन चलता रहा अल्लाह भी इनका परीक्षा लेता रहा। जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्लाम के पास अब कुछ भी कुर्बान करने के लिए नहीं बचा तो उन्होंने अल्लाह की बारगाह में इतेज़ा की कि या अल्लाह अब हमारे पास कुछ भी कुर्बान करने को नहीं बचा हैं। तो अल्लाह ने ख़्वाब में कहां अपनी सबसे पसंददीदा चीज़ को कुर्बान करो। ये आदेश होते ही हज़रत इब्राहीम अलैहिस्लाम समझ गए की उन्हें अपने बेटे हज़रत इस्माइल अलैहिस्लाम को कुर्बान करना पड़ेगा क्यों की उनके सबसे पसंददीदा उनके बेटे ही थे। उसके बाद ये सब वाक्या अपने बेटे को बताया तो बेटे ने कहा अब्बा हुज़ूर आप मुझे अल्लाह की बारगाह में कुर्बान करेंगे मेरे लिए इससे बड़ी नेमत और क्या हो सकती हैं । उसके बाद अगले सुबह अपने बेटे को नहलाया और नया कपड़ा पहना के कुर्बान गाह की तरफ़ ले कर चल पड़े। कुर्बान गाह पहुंचने के बाद बेटे ने कहां की अब्बा हुज़ूर आप अपने और मेरे आंखों पर पट्टी बांध दीजिए। उसके बाद आंखो पर पट्टी बांधी गई और कुर्बान गाह में लिटा दिया, और उसके बाद छुरी चला दिया। छुरी चलाने के बाद आंख से पट्टी हटा कर देखते हैं तो छुरी हज़रत इस्माल के गर्दन पर नहीं बल्कि दुम्मा भेड़े कि गर्दन पर चली हैं। और हज़रत इस्माइल बाहर खड़े हैं। अल्लाह के इस करिश्में से सब का ईमान ताज़ा हो गया। और यहीं से हर मुसलमान के उपर कुर्बानी वाजिब हो गई।
कुर्बानी किस पर वाजिब हैं?
कुर्बानी हर उस मुसलमान पर वाजिब हैं जो साहिबे ए हैसियत हैं जिस शख्स के पास साढ़े सात तोला सोना या साढ़े बावन तोला चांदी हो उसपर कुर्बानी वाजिब हों जाती हैं।
कुर्बानी किस पर वाजिब नहीं हैं?
कुर्बानी उस शख्स पर वाजिब नहीं जो मांग कर खाता हों या अपना पेट पालने तक ही कमाता हो। या उस पर किसी का कर्ज़ हों जो अदा न कर पता हो यानि कुल मिलाकर जो मुसलमान साहिबे ए हैसियत ना हों उस पर कुर्बानी वाजिब नहीं हैं।














